ल्यूपस : जानकारी व उपचार

(क) ल्यूपस के प्रत्येक रोगी को सही चचिचकत्सा व सबसे अच्छी दवाएँ चमिलेंगी। यह दुस्साध्य रोग चकतना प्रचिण, चकतना भयावह हो सकता है, इस जानकारी के समिुचचित प्रसार से वैसे रोचगयों की संख्या मिें बहुत कमिी आयेगी, जो अपना इलाज नहीं करवाते हैं। रोग के देर से पता लगने की घटना भी कमि होगी।

(ख) रोग के देर से पता लगने से गुरदा, यकृत, हृदय, मिसस्तिष्क आचद अंगों, चजन पर जीवन सीधे तौर पर चनभर्भर है, को भारी क्षचत पहुँचि सकती है। ल्यूपस ट्रस्ट इंचडिया को ऐसे कई दृष्टान्त चमिले हैं, चजनमिें रोग के देर से पता लगने से न केवल शरीर बुरी तरह से बबार्भद हो गया है, बसल्कि रोगी को भारी आचरर्भक क्षचत भी झेलनी पड़ी है, व उसका जीवन हमिेशा के चलए असामिान्य हो गया है।

(ग) इस रोग के देर से पता लगने का प्रमिुख कारण चचिचकत्सकों मिें भी समिुचचित जानकारी का अभाव है।

(घ) ल्यूपस को “नक़ल का मिाचहर” भी कहते है, क्योंकचक इस रोग मिें एकदमि से वे लक्षण ही उभर कर सामिने आते हैं, जो हृदय, यकृत आचद अंगों के रोगों मिें होते हैं। रोगी को प्रायः यह कहा जाता है चक उसे वृक-दोष (चकडिनी का रोग) या मिाइग्रेन या चलवर की बीमिारी है, जबचक वास्तिव मिें वह अंदर ही अंदर ल्यूपस से ग्रस्ति रहता है; चचिचकत्सक बीमिारी का सही आकलन नहीं कर पाते हैं।

(ङ) ल्यूपस का पता ख़ून की कुछ ख़ास जाँचिों से चिलता है। जैसे ए०एन०ए० (ऐंटी न्यूसक्लियर ऐंटीबौडिी), ऐंटी डिी०एस०डिी०एन०ए० (ऐंटी डिबल स्ट्रैंडिेडि डिीएनए), सी3 कौसमम्प्लिमिेंट, व अन्य आमि जाँचिें, जैसे सी०बी०सी०।

(चि) अचधकांशतया लोग दवा इन कारणों से छोड़ देते हैं:

→ उन्हें दवाओं का मिहत्त्व नहीं पता होता है → आचरर्भक तंगी के कारण

→ लोगों की नज़रों मिें आने से बचिने के चलए: ल्यूपस के रोचगयों का रूप-रंग, शरीर का आकार चवशेषतया स्टीयरॉएडि व अन्य दवाओं की भारी मिात्रा के प्रभाव मिें ख़राब होने लगता है

→ गचठिया के डिॉक्टर से सलाह चलए चबना ही वैकसल्पिक उपचिार का रुख़ करना

→ ज्यों-ज्यों रोग लक्षण ग़ायब होते जाते हैं, रोगी व उसके घर वालों को लगने लगता है चक रोग का चनवारण हो चिुका है! मिगर दवाओं के प्रभाव पर चनकट से ध्यान देना, व उसकी ख़ुराक को वातरोग चवशेषज्ञ की देख-रेख मिें धीरे-धीरे चनयंचत्रत करना चिाचहए।

आर्थिक सहायता

(क) प्रत्येक ल्यूपस रोगी को रोग की पहचिान व चनदान के चलए ख़ूब पैसे ख़चिर्भ करने पड़ते हैं। यह ट्रस्ट आचरर्भक रूप से अक्षमि हर रोगी की आचरर्भक मिदद करने की हर सम्भव कोचशश करेगा।

(ख) ल्यूपस के रोचगयों को हर मिहीने/ हर सप्ताह/ हर तीन मिहीने मिें आचरर्भक धका झेलना पड़ सकता है, चजसमिें इन जाचिों का ख़चिर्भ वहन करना चनचहत है:

→ रक्त की चनयचमित जाँचि का ख़चिर्भ → स्कैन पर → दवाओं पर → अन्य अंगों की जाँचि पर – दृचष्टपटल (रेटीना), हृदय की जाँचि व अन्य सम्बद्ध जाँचिों पर:

  1. मिोचतयाचबन
  2. दृचष्टपटल
  3. अससरयों की सघनता/ रक्तसंचिार के अभाव मिें अससरक्षय (ए०वी०एन०)
  4. स्नायुओं/ मिांसपेचशयों का रोग

(ग) ग़रीबी रेखा के नीचिे के रोगी – रोग की जाँचि व उपचिार इतने मिहंगे होने के कारण ख़चिर्भ चनम्न आय वगर्भ के लोगों की सीमिा के पार चिला जाता है। पररणामि होता है असह्य पीड़ा, अंगहारन, कुछ करने में असमरर्थि व एकाकी जीवन रबिताने को बिाध्य हो जाना।

(घ) एक बार समिय पर उपचिार शुरू हो जाने पर रोगी की ससरचत मिें धीरे-धीरे सुधार देखा जा सकता है, व अचधकांश रोगी तो पुनः अपनी चदनचियार्भ पर भी लौट आते हैं!

(डि.) चनष्पक्षता – रोचगयों मिें चबना कोई भेद-भाव चकये उनकी आवश्यकता के अनुसार ट्रस्ट सहायता करेगा; यह देखेगा चक उनकी ज़रूरतें कहाँ तक मिुनाचसब हैं, ताचक उन्हें अचधक से अचधक लाभ पहुँचिाया जा सके।

रोज़गार व आय

(क) ट्रस्ट हर सम्भव प्रयास करेगा चक रोगी कामि करने के योग्य व आचरर्भक रूप से सुरचक्षत हो जाएँ, व चफिर से सामिान्य जीवन चबताने लगें।

(ख) रोग-रोधी क्षमिता को दबाने से अक्सर संक्रमिण का अंदेशा रहता है, चजससे बचिने के चलए ऐंटीबाइयौचटक दवाइयाँ देनी पड़ सकती हैं व अन्य उपाय करने पड़ सकते हैं।

(ग) अक्सर छुट्टी लेने की ज़रूरत व लगातार कामि कर सकने मिें असमिरर्भता के कारण रोगी की कायर्भक्षमिता और उत्पादकता घट जाती है। ऐसी ससरचत मिें अपने ऊपर के लोगों व सहकचमिर्भयों की सहानुभूचत की आवश्यकता होती है। सार ही कायार्भलय मिें चवश्रामि करने का सरान/ रोगी-कक्ष व घर से कामि करने की सुचवधा भी अभीष्ट होगी।

(घ) चवकलांग अचधचनयमि (पी०डिब्ल्यू०डिी० ऐक्ट) मिें ल्यूपस के रोचगयों को भी सभी सरकारी व चनजी उद्यमिों की प्रचतयोचगता परीक्षाओं मिें चवचशष्ट सुचवधाएँ देने की बात कही गयी है।

(चि) यह ट्रस्ट पुराने रोचगयों के चलए एक मिानव संसाधन चवभाग की तरह कामि करेगा, चजसके तहत बाहर की कं पचनयों के चलए चवषय-वस्तिु तैयार करवाने, शैचक्षक सेवाएँ प्राप्त करने व रचिनात्मक समिाधान ढूँढ़ने के कामि चदलवाए जायेंगे।

परानुभूरत

(क) ल्यूपस के रोचगयों की सहायता के चलए इसे एक लम्बी चिलने वाली बीमिारी के रूप मिें पहचिान देने के चलए यह आवश्यक है चक रोगी के पररवार के लोग, व पूरा समिाज ही रोगी के कष्ट को समिझें।

(ख) लोगों की नज़रों मिें हमिेशा एक बीमिार व्यसक्त के रूप मिें आते-आते रोगी स्वयं को अकेला मिहसूस करने लगता है।

(ग) चववाह या गभर्भधारण मिें चवलम्ब से ल्यूपस के रोचगयों पर पड़ने वाला दबाव और भी बढ़ जाता है।

(घ) ल्यूपस की पहचिान अचधकांशतया 15 से 35 वषर्भ की कच्ची उम्र मिें होती है। ये वषर्भ जीवन के चलए चनणार्भयक होते हैं, तरा पढ़ाई व जीचवका के चलए संघषर्भ की इस उम्र मिें कुछ वषर्भ भी रोग की वजह से पीछे रह जाना रोगी के चलए अत्यंत ही तनाव व अवसाद का कारण बन जाता है।

(डि.) सहयोगी चनकायों के प्रयास से व सदस्य रोचगयों से घुलने-चमिलने से आमि लोगों मिें ल्यूपस की जानकारी का प्रसार होगा व आमि लोग ल्यूपस रोचगयों का ददर्भ समिझ पायेंगे।

(चि) आरोग्य संबंधी चशक्षा मिें लोगों की सहभाचगता।

(छ) लम्बे समिय से ल्यूपस को झेल रहे रोचगयों की ससरचत व मिनःससरचत से आमि लोगों को अवगत कराना।

(ज) अनेक रोचगयोंको इस कारण से कामि नहीं चमिलता या कामि छोड़ना पड़ जाता है चक उन्हें रात की पाली मिें या औचफ़स के घंटों से अचधक कामि करना पड़ता है। इस बेकारी की वजह से उन्हें समिारोहों-पाचटर्भयों मिें लोगों के बीचि मिें अक्सर नीचिे देखना पड़ सकता है या वे स्वयं को अकेला सा मिहसूस कर सकते हैं।

(झ) यचद पररवार के लोग या वे लोग, चजनके साचन्निध्य मिें हमि सहारे का अनुभव करते हैं, यह पता चिलने पर, चक हमिें ल्यूपस जैसा असाध्य रोग है, हमिसे मिुँह मिोड़ लें, या हमिारा चववाह टूट जाये, वैसी ससरचत मिें भी हमिारा मिन टूट जायेगा , हमि अकेला मिहसूस करने लगेंगे। तो पररवेश के लोगों के चलए ऐसी ससरचत को भी समिझना मिहत्त्वपूणर्भ है; लोगों को दुभार्भवपूणर्भ बातों को छोड़ रोचगयों का दुख समिझना सीखना चिाचहए।

मानरसक व भावात्मक रूप से आश्रय

(क) ल्यूपस न्यास रोचगयों व उनके पररवारों को एक सार करने वाले मिंचि या चनकाय की तरह कामि करेगा। इसमिें सफिलता मिानवता की बड़ी सेवा होगी।

(ख) जाँचि मिें ल्यूपस की पहचिान होते से न केवल रोगी को बसल्कि उसके पररवार को भी गहरा धका लगता है। दूसरे रोचगयों से बात करके मिरीज़ व उसके घर वालों को भी मिानचसक रूप से राहत चमिलती है; उन्हें यह अहसास होता है चक वे अकेले नहीं हैं। सुख- दुख मिें परस्पर सार चनभाने वाले व एक-दूसरे को समिझने वाले लोगों का साहचियर्भ अपने आप मिें सुधार की चदशा मिें एक क़दमि है।